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इतना भुलाया है तुझे कि थक गया हूँ मैं  अब तेरे सिवा कुछ भी याद नहीं है... मंजरी
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वो ग़मों को दूर करने की बात करते है ग़मों ने ही अब तक हमें संभाल रखा है... मंजरी
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मेरे दरवाज़े पर उम्र भर से खड़ी है तन्हाई और भीतर उसकी यादों से महकता आँगन है ... मंजरी
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तू आ जाए तो वक़्त गुज़र जाए मेरा इंतज़ार को भी अब इंतज़ार है तेरा... मंजरी
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मेरे सपनें भी शामों सहर जिसके पास पड़े है गिरवी वो महरूम रखना चाहता है अपनी यादों से मुझे... मंजरी
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वफ़ा की दास्ताँ अभी मुकम्मल भी ना हुई और तुमने गैरों का दामन थाम लिया ... मंजरी
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चाँदनी नाराज़ हैं अब तो महीनों से  अमावस संग दोस्ती कर ली मैंने ... मंजरी 
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तेरी यादों से अब डरने लगे है दिए ज़ख्म तेरे अब भरने लगे है मोहब्बत की क़द्र अब की तूने जब गैर हम पर मरने लगे है ...... मंजरी
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करीने से सजा है आज भी तेरे कमरे का हर सामान तेरी चुप्पी के साथ ही ठहर गया वक़्त, बरसों पहले... मंजरी
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तेरे हिस्से की कहानी याद है मुझको मेरे हिस्से का दर्द तू भूलेगा कैसे... मंजरी
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बिछड़ने पर इक वो ही नहीं मिला मुझको दुबारा कौन कहता है शिद्दत से चाहो तो मिलता है सब.... मंजरी
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लफ़्ज़ों से कहाँ होती है मोहब्बत की बात याद नहीं पड़ता उसने कुछ कहा हो कभी ..... मंजरी

आखिर कहाँ चली गई तुम ......

आखिर कहाँ चली गई तुम ...... हज़ारों बहानें ढूँढ लिए है खुद को तुझसे जोड़ने के लिए तेरा सामान रखता और उठाता हूँ फ़िर शाम तक वो जगह भूल जाता हूँ............... तेरी तस्वीर भी साथ रखता हूँ आईना देखते समय धुंधली नज़रों से तुझे सँवारता हूँ....................... बिखरती धूप के हर कोने को सिमटकर चाँदनी बनते देख हर कोने में फिरता हूँ ढूँढता हूँ ............ कितना खोजता है मेरा उदास मन तेरी एक झलक पाने को वो तस्वीर............ हँसती लाल सुर्ख रंग की वो चूनर अब तस्वीर में भी मटमैली हो गई होगी........... काले तिल वाले गोरे गालों पर ना जाने कितनी उदासियाँ पसरी होंगी............... मेहंदी लगा इतराता हाथ झुर्रियों से भर गया होगा............ नन्हें पाँव की थिरकन महसूस होती थी तुम्हारे पेट पर कभी इक उम्र का सफ़र तय कर चुके होंगे.... पुरानी डायरी भी उबासी लेकर सो गई पीले ज़र्द पन्नों के साथ पूछते हुए..... जब हर जगह मौजूद हो तुम तो क्यों नहीं दिखाई देती मेरी इन मोटी लैंस की ऐनक के पीछे झाँकती पुतलियों को आखिर कहाँ चली गई तुम ...... डॉ. मंजरी शुक्ला (published in news paper) ...
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तमाशबीन की सरहदों को देखा हैं किसने क़त्ल करके भी अनजान खड़े रहते है .... मंजरी
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उस मुकाम पे आ गया हूँ मैं मोहब्बत में तेरी बद्दुआ भी अब दुआ सी लगती है मुझे ... मंजरी 21 april 2015
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किसी की निगाह में जब मोहब्बत देखता हूँ तेरी बेवफ़ाई जार- जार रुलाती है मुझे वो करते है बात महफ़िलों की रौनक की अब तो बस तन्हाई ही लुभाती है मुझे... मंजरी 20 april 2015..
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ख्वाबों में भी, देते रहे दुआएँ जिसको उस की बद्दुआ ने ही, तन्हा किया मुझे........ मंजरी
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बेचा हैं जिसने अपना बचपन बाजारों मैं वो कैसे जाएगा खिलौनों की दुकानों में........ मंजरी
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मेरे दिल के टुकड़े है ये, तेरे रब के घर नहीं जो रोज़ गिरते है , और फिर बन जाते है .............. मंजरी
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तेरे रूठ के जाने में भी ये ख़ुमार रहा कि मिलूँगा फिर, तुझे मनाने के लिए...... मंजरी