Tuesday, 23 August 2016

आखिर कहाँ चली गई तुम ......


आखिर कहाँ चली गई तुम ......

हज़ारों बहानें ढूँढ लिए है
खुद को तुझसे जोड़ने के लिए
तेरा सामान रखता और उठाता हूँ
फ़िर शाम तक वो जगह भूल जाता हूँ...............
तेरी तस्वीर भी साथ रखता हूँ
आईना देखते समय
धुंधली नज़रों से तुझे सँवारता हूँ.......................
बिखरती धूप के हर कोने को
सिमटकर चाँदनी बनते देख
हर कोने में फिरता हूँ ढूँढता हूँ ............
कितना खोजता है मेरा उदास मन
तेरी एक झलक पाने को वो तस्वीर............
हँसती लाल सुर्ख रंग की वो चूनर
अब तस्वीर में भी मटमैली हो गई होगी...........
काले तिल वाले गोरे गालों पर ना जाने
कितनी उदासियाँ पसरी होंगी...............
मेहंदी लगा इतराता हाथ
झुर्रियों से भर गया होगा............
नन्हें पाँव की थिरकन महसूस होती थी
तुम्हारे पेट पर कभी
इक उम्र का सफ़र तय कर चुके होंगे....
पुरानी डायरी भी उबासी लेकर सो गई
पीले ज़र्द पन्नों के साथ पूछते हुए.....
जब हर जगह मौजूद हो तुम
तो क्यों नहीं दिखाई देती
मेरी इन मोटी लैंस की ऐनक
के पीछे झाँकती पुतलियों को
आखिर कहाँ चली गई तुम ......

डॉ. मंजरी शुक्ला
(published in news paper)

Sunday, 28 June 2015

तमाशबीन की सरहदों को देखा हैं किसने
क़त्ल करके भी अनजान खड़े रहते है ....
मंजरी

Tuesday, 21 April 2015

उस मुकाम पे आ गया हूँ मैं मोहब्बत में
तेरी बद्दुआ भी अब दुआ सी लगती है मुझे ...

मंजरी
21 april 2015

Monday, 20 April 2015

किसी की निगाह में जब मोहब्बत देखता हूँ
तेरी बेवफ़ाई जार- जार रुलाती है मुझे
वो करते है बात महफ़िलों की रौनक की
अब तो बस तन्हाई ही लुभाती है मुझे...

मंजरी
20 april 2015..

Thursday, 27 September 2012


ख्वाबों में भी, देते रहे दुआएँ जिसको
उस की बद्दुआ ने ही, तन्हा किया मुझे........

मंजरी

बेचा हैं जिसने अपना बचपन बाजारों मैं
वो कैसे जाएगा खिलौनों की दुकानों में........

मंजरी

मेरे दिल के टुकड़े है ये, तेरे रब के घर नहीं
जो रोज़ गिरते है , और फिर बन जाते है ..............

मंजरी