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उस मुकाम पे आ गया हूँ मैं मोहब्बत में तेरी बद्दुआ भी अब दुआ सी लगती है मुझे ... मंजरी 21 april 2015
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किसी की निगाह में जब मोहब्बत देखता हूँ तेरी बेवफ़ाई जार- जार रुलाती है मुझे वो करते है बात महफ़िलों की रौनक की अब तो बस तन्हाई ही लुभाती है मुझे... मंजरी 20 april 2015..
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ख्वाबों में भी, देते रहे दुआएँ जिसको उस की बद्दुआ ने ही, तन्हा किया मुझे........ मंजरी
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बेचा हैं जिसने अपना बचपन बाजारों मैं वो कैसे जाएगा खिलौनों की दुकानों में........ मंजरी
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मेरे दिल के टुकड़े है ये, तेरे रब के घर नहीं जो रोज़ गिरते है , और फिर बन जाते है .............. मंजरी
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तेरे रूठ के जाने में भी ये ख़ुमार रहा कि मिलूँगा फिर, तुझे मनाने के लिए...... मंजरी
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तेरे ख्यालों से जब भी, रोशन हुआ दिल का कोना मेरी तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा मुझको ........ मंजरी